(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.324. अध्यायः 324
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मण युधिष्ठिरंप्रति दारापत्यादिषु स्नेहत्यागपूर्वकं धर्माचरणचोदकजनकपञ्चशिखसंवादानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच। 12-324-0x(6521)(78504)
ऐश्वर्यं वा महत्प्राप्य धनं वा भरतर्षभ।
दीर्घमायुरवाप्याथ कथं मृत्युमतिक्रमेत्॥ 12-324-1(78505)
तपसा वा सुमहता कर्मणा वा श्रुतेन वा।
रसायनप्रयोगैर्वा कैर्नाप्नोति जरान्तकौ॥ 12-324-2(78506)
भीष्म उवाच। 12-324-3x(6522)
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
भिक्षोः पञ्चशिखस्येह संवादं जनकस्य च॥ 12-324-3(78507)
वैदेहो जनको राजा महर्षि वेदवित्तमम्।
यर्यपृच्छत्पञ्चशिखं छिन्नधर्मार्थसंशयम्॥ 12-324-4(78508)
केन वृत्तेन भगवन्नतिक्रामेज्जरान्तकौ।
तपसा वाऽथवा बुद्ध्या कर्मणा वा श्रुतेन वा॥ 12-324-5(78509)
एवमुक्तः स वैदेहं प्रत्युवाचापरेक्षवित्।
निवृत्तिर्नैतयोरस्ति नातिवृत्तिः कथंचन॥ 12-324-6(78510)
न ह्यहानि निवर्तन्ते न मासा न पुनः क्षपाः।
सोयं प्रपद्यतेऽध्वानं चिराय ध्रुवमध्रुवः॥ 12-324-7(78511)
सर्वभूतसमुच्छेदः स्रोतसेवोह्यते सदा।
ऊह्यमानं निमज्जन्तमप्लवे कालसागरे॥ 12-324-8(78512)
जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदतिवर्तते।
नैवास्य कश्चिद्भवति नासौ भवति कस्यचित्॥ 12-324-9(78513)
पथि संगतमेवेदं दारैरन्यैश्च बन्धुभिः।
नायमत्यन्तसंवासो लब्धपूर्वो हि केनचित्॥ 12-324-10(78514)
क्षिप्यन्ते तेनतेनैव निष्टनन्तः पुनः पुनः।
कालेन जाता याता हि वायुनेवाभ्रसंचयाः॥ 12-324-11(78515)
जरामृत्यू हि भूतानां खादितारौ वृकाविव।
बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि॥ 12-324-12(78516)
एवंभूतेषु भूतेषु नित्यभूताध्रवेषु च।
कथं हि हृष्येज्जातेषु मृतेषु च न संज्वरेत्॥ 12-324-13(78517)
कुतोऽहमागतः कोऽस्मि क्व गमिष्यामि कस्य वा।
कस्मिन्स्थितः क्व भविता कस्मात्किमनुशोचसि॥ 12-324-14(78518)
द्रष्टा स्वर्गस्य न ह्यस्ति तथैव नरकस्य च।
आगमास्त्वनतिक्रम्य दद्याच्चैव यजेत च॥ ॥ 12-324-15(78519)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि चतुविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ 324॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-324-14 कुतस्त्वमागतः क्वासि त्वं गमिष्यसि कस्यवेति ड. पाठः॥


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